मुसाफिर

चलते-चलते में कब बन गया मैं मुसाफिर,
कोई रास्ता नहीं , कोई मंजिल नहीं,
जहां रुके पग मेरे दिखे वही रास्ता,
मेघ छाए थे कब से फिर आए हैं घिर,
चलते-चलते में कब बन गया मैं मुसाफिर,
अब कुछ खास नहीं , अब कोई आस नहीं,
शायद डूब गया वह तिनका जो देता सहारा,
चल दिए जो यहां से न लौट कर आएंगे फिर,
चलते-चलते में कब बन गया मैं मुसाफिर |

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